डॉ. राजेंद्र प्रसाद की चली होती, तो शायद 26 जनवरी नहीं होता गणतंत्र दिवस 

आपने कभी सोचा है कि भारत का संविधान 26 जनवरी 1950 को ही क्यों लागू किया गया था, जबकि यह नवंबर 1949 में ही बन कर तैयार हो चुका था! इस सवाल का जवाब खोजते हुए आप उस कहानी तक भी पहुंच जाते हैं, जब देश के पहले राष्ट्रपति  के तौर पर डॉ. राजेंद्र प्रसाद के नाम काफी चर्चा हो में था.

डॉ. राजेंद्र प्रसाद की चली होती, तो शायद 26 जनवरी नहीं होता गणतंत्र दिवस 
आपने कभी सोचा है कि भारत का संविधान 26 जनवरी 1950 को ही क्यों लागू किया गया था, जबकि यह नवंबर 1949 में ही बन कर तैयार हो चुका था! इस सवाल का जवाब खोजते हुए आप उस कहानी तक भी पहुंच जाते हैं, जब देश के पहले राष्ट्रपति  के तौर पर डॉ. राजेंद्र प्रसाद के नाम काफी चर्चा हो में था. तब पहले प्रधानमंत्री जवाहरलाल नेहरू नहीं चाहते थे कि प्रसाद राष्ट्रपति बनें इसलिए उन्होंने एक कुटनीतीक चाल भी चली थी और फिर उसकी सफाई भी पेश कर दी.
 
नेहरू और प्रसाद के बीच विचारधाराओं को लेकर मतभेद था, जो उभरकर सामने आता रहा. पहले आपको यही बताते हैं कि गणतंत्र दिवस के लिए तारीख क्यों और कैसे मुकर्रर हुई थी. नेहरू या प्रसाद, 26 जनवरी की तारीख तय करने के पीछे किसकी चली थी?
 
गणतंत्र दिवस 26 जनवरी को क्यों?
 
अंग्रेज़ों के खिलाफ भारत के स्वधीनता संग्राम में 26 जनवरी तारीख का अपना महत्व रहा था. 1929 में कांग्रेस का लाहौर अधिवेशन हुआ था, तब उस साल इसी तारीख को पूर्ण स्वराज का ऐलान किया गया था. इस दिन को न केवल नेताओं, बल्कि इतिहासकारों ने भी भारत के संप्रभु गणतंत्र बनने की यात्रा में एक अहम पड़ाव माना.
 
इसी दिन को ऐतिहासिक रूप से महत्व देने के मकसद से 26 जनवरी को गणतंत्र लागू किए जाने का निर्णय किया गया था. लेकिन संविधान तैयार होने के दो महीने बाद की इस तारीख को चुनने के लिए राह आसान नहीं थी. वजह थी प्रधानमंत्री बनाम राष्ट्रपति मतभेद.
प्रसाद नहीं चाहते थे यह तारीख!
 
जी हां, राजेंद्र प्रसाद भारतिय संस्कार को मानने वाले थे और धर्म व ज्योतिष में विश्वास करते थे, जबकि इसके उलट नेहरू नये विचार के माने जाते थे. और बेहतर ढंग से कहा जाए तो उन पर पश्चिमी विचार धारा का गहरा प्रभाव था. प्रसाद का मानना था कि ज्योतिष के अनुसार 26 जनवरी की तारीख शुभ नहीं है, लेकिन नेहरू ने इस दलील को अस्वीकार करार दिया.
 
आखिर में नेहरू के अड़ने और इतिहास के हवाले से रखे गए प्रस्ताव को स्वीकार किया गया क्योंकि एक तरह से यह नेहरू की 'एक बात तो रखी जाए' वाला मामला हो गया था. 26 जनवरी 1950 को प्रसाद ने राष्ट्रपति पद की शपथ ग्रहण की थी, लेकिन तारीख के मामले में जीते नेहरू, राष्ट्रपति कौन बने, इस मामले में मन मसोसकर रह गए थे.